अयोध्या राम मंदिर इतिहास | Ayodhya Ram Mandir History – जानकारी पुरे हिन्दी में

जैसे कि आप लोग नाम तो सुनने होंगे अयोध्या के बारे में आज में अयोध्या का पुरा इतिहास बताने वाला हूं
अयोध्या स्थित भगवान श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का पूरा इतिहास शब्दों में समेटना किसी के लिए भी बस के बात नहीं था और इसके ऐतिहासिकता और क़ानूनी महत्त्वपूर्ण को तो फिर भी काफ़ी हद तक समेटा जा सकता था ।
और इसके असीमित धार्मिक-सांस्कृतिक और पौराणिकता मान्यताओं और उनसे जुड़े तथ्यों को श्ब्दों में सहेजना असंभवता भी है।
लेकिन यहां पर हमने इस पवित्रता मन्दिर के बारे में उसकेबाद हर पहलुओं को कुछ गिनती के शब्दों में समेटे की कोशिशें की है, जिसकी शुरुआती धार्मिक-सांस्कृतिक ग्रन्थों और पौराणिकता मान्यताओं से की जा रही है।
भगवान श्री राम के पुत्र कुश ने बनवाया था पहला राम मंदिर पौराणिकता कथाओं और धर्मनिरपेक्षता ग्रन्थों के आधारभूत पर तय हुईं परंपरागत धारणाओं के अनुसार अयोध्या के पवित्र श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के और तो और इतिहासकारों का विवरणों कुछ इस प्रकारों है।
जबकि भगवान् श्री राम प्रजापत संहिताओं बैकुंठपुर धाम चले गए तो पूरी अयोध्यावासियों नगरीय (मंदिर-राज महल-घर-द्वार) सरयू में समाहित हो गई। मात्रा अयोध्यावासियों का भू-भागों ही बच गया और वर्षों तक यह भूमि यूं ही पड़ी रही।
बाद में कौशांबी के महाराजा कुश ने अयोध्यावासियों को फिर से बसाया। इसका वर्णन कालिदास के ग्रंथ ‘रघुवंश’ में मिल्ने की बात कहीं जाती है।
लोमश रामायण-महाभारत के अनुसार उन्होंने ही सर्वप्रथम पत्थरों के खंडों वाले मंदिर का अपने परम पिता की पूज्य जन्मभूमिश्च पर निर्माण करवाया। वहीं जैन परंपराऐं के मुताबिक़ अयोध्या को ऋषभदेव ने फिर से बसा लिया था ।

महाराजा विक्रमादित्य ने बनवाया था भव्य राम मंदिर

आपलौग सुनने हो या देखें होंगे भविष्य पुराणों के अनुसार उज्जैनी के महाराज विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व में एक बार फिर से (दूसरी बार) उजड़ चुकी अयोध्या का निर्माण करवाया।
धार्मिक-सांस्कृतिक ग्रन्थों के अनुसार उन्होंंने अयोध्यावासियों में सरयू नदी के लक्ष्मण घाटी को आधार बनाकर 360 मन्दिरों का निर्माण करवाया था।
फिर वे भगवान विष्णुजी के परम भक्त थे और इसी लिए उन्होंंने ही श्रीरामजी जन्मभूमि पर एक भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया था। हिन्दू पक्ष का दावा रहा है
कि बाबरी से पहले-पहले भी 1033 में मुस्लिमो आक्रमणकारी सालार मसूद ने जन्मभूमि-बाबरी मंदिर को ध्वस्तीकरण कर दिया था। उसके बाद गाहड़वाल वंशज के राजाओं-महाराजाओं द्वारा इस पवित्र मन्दिर का फिर से निर्माण फिर से (तीसरी बार) करवाया गया था।

1510-1511 में गुरुनानक देव जी ने किए थे जन्मभूमि के दर्शन

श्री राम जन्मभूमि अयोध्या मंदिर पर विवाद की कहानी की 1528 से शुरू हुई। हिंदुओं का दावा रहा है कि मुगल आक्रमणकारी बाबरी ने उस पवित्र जगह को तोड़कर उस पर मस्ज़िद का निर्माण करवाया दिया।
और अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी बाबरी मस्जिद विवादों पर अपनाने ऐतिहासिकता फ़ैसला देते समय सु्प्रीम कोर्ट ने उन सिख धर्म ग्रंथों को भी अहम सबूतों माना है,
फिर जिसके मुताबिक़ सिख धर्मनिरपेक्षता के संस्थापकों गुरु नानकदेव देव जी आक्रमणकारी बाबर के भारत आने-जाने से पहले ही भगवान श्री राम की जन्मभूमि के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच गया थे।
और गुरु नानकदेव देव जी 1510 से 1511 के बीचों-बीच अयोध्या आए थे, जबकि बाबरी मस्ज़िद 1528 में बनाईं गई थी।इतिहासकारों के अनुसार वहां पर बाबर के कहने पर उनके एक सूबेदार ने मस्ज़िद का निर्माण करवाया था।

1859 में राम चबूतरे पर फिर से पूजा की मिली इजाजत

अयोध्या का राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद को लेकर सभी जन्मभूमि के आस-पास के पुरे इलाके में पहली बार सन्1853 में दंगों का ज़िक्र हुए और सन् 1859 में अंग्रेज़ों ने इस विवाद को रोकने लिए मुसलमानों को ढ़ांचे के अंदर और हिंदुओं का राम चबूतरे पर पूजा-अर्चना की इजाज़त भी दी थी
और सन् 1885 में पहली बार महन्त रघबीर दास बाबरी मस्ज़िद के पास के सभी मंदिरों निर्माण को लेकर फैज़ाबाद कोर्ट-कचहरी में एक याचिका लगाई, जिसे कोर्ट ने ठुकराई दिया।

23 दिसंबर, 1949 को ढांचे के अंदर अचानक रामलला की मूर्ति पाई गई

सन् 23 दिसंबर, 1949 को अयोध्या राम जन्मभूमि मन्दिर के इतिहासकारों में एक बार से जबर्दस्ती तोड़ आ गया। उस दिन रामलीला की प्रतिमा मस्ज़िद के अंदर अचानक से विराजमान पाईं गई।
और यह विवाद इतना बढ़ा कि आख़िरकार तात्कालीन सरकारी उस ढांचे को विवादित मानकर आखरी में उसपर ताला लगवा ही दिया ढांउचे के अन्दर नमाज़ रुक गई, लेकिन बाहर राम चबूतरे और परिस्थितियों के बाक़ी हिस्सों में पूजा-अर्चना निरन्तर चलती रहीं।

1986 में विवादित ढांचे का ताला खुला, फिर से अंदर पूजा शुरू हुई

सन् 1950 से तात्कालिकता विवादित परिसरों को लेकर भारत का कानूनी जंग शुरू कर दिया गया। तब जा के गोपाल विशारद और रामचंद्र दास ने ढांचे के अंदर रामलला की पूजा की इजाजत और उनकी प्रतिमा वहीं रहने देने की अनुमति के लिए फ़िरोज़ाबाद सिविलियन कोर्ट में दो अर्जी दाखिला की।
और सन् 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने भी तीसरी बार अर्जी लगा दी। इसके जवाब में सन् 1961 में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित जगह पर कब्जा लेने और ढांचे के अंदर से मूर्तियां हटाने की अर्जी लगाई।
25 वर्ष के बाद सन्1986 में यूसी पांडे की याचिका पर फैज़ाबाद के जिला जज केएम पांडे ने 1 फरवरी, वर्ष 1986 के ऐतिहासिक फैसले में विवादित ढांचे से ताला हटाने का आदेश दिया और हिंदुओं को पूजा करने की अनुमति भी दे दी।

सन् 1989 में विवादित परिसर के पास ही शिलान्यास किया गया

वर्ष 1989 अगस्त महीने में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैजाबाद जिला अदालत से टाइटल सूट अपने हाथों-हाथ में ले लिया और विवादित ज़मीन पर यथास्थितिवादी बरक़रार रखनेवाले का आदेश भी दे दिया।
यानि कि पूजा-अर्चना निरंतर ज़ारी रही। नवंबर, सन् 1989 में तत्कालीन सरकारी ने विश्व हिन्दू परिषद् के विवादित भूमि के पास ही शिलान्यासों की इजाज़त दे दी। 6 दिसंबर, वर्ष 1992 को अयोध्या में राम जन्मभूमि आन्दोलन से जुड़े लाखों लोगों में सेवक जुटे थे।
उन्होंने ही उस विवादित ढांचे को ध्वस्तीकरण दिया। और भगवान रामलला ढांचे से निकलकर अस्थाई टेंट में आ गए। सुप्रीम कोर्ट ने उस विवादित जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दे दिया
और 6 दिसंबर, वर्ष 1992 से लेकर 9 नवंबर, 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक रामलला उसी अस्थाई टेंट में विराजमान रहे थे।
लेकिन उनकी पूजा-अर्चना और दर्शनों का कार्यक्रम निरंतर संपन्नता होता रहा। वर्ष 1993 में तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने विवादित जमीन के आसपास की 67 एकड़ अतिरिक्त जमीन को भी अधिग्रहित कर लिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी राम जन्मभूमि का हिस्सा हिंदुओं को दिया

अप्रैल महीने वर्ष 2002 से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन के मालिकाना हक पर सुनवाई शुरू की। 30 सितंबर, सन् 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2-1 जजों के बहुमतों के फ़ैसले से विवादित संपत्तियों को तीन दावेदारों में बांटने का फ़ैसला सुनाया
जन्मभूमि समेत एक-तिहाई हिस्सा हिंदुओं को, एक-तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा मुस्लिम पक्ष को। मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कई याचिकाओं को देखने के बाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।
बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में मध्यस्थता की कोशिशें भी की गईं, लेकिन विवादों का कोई हल नहीं निकला।

और श्री राम मंदिर का निर्माण 5 अगस्त से

आख़िरकार तत्कालीन चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वालीं सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 40 दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद जा के 16 अक्टूबर, 2019 को दशकों पुराने इस कानूनी विवाद पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
अंत में 9 नवंबर, 2019 का वह ऐतिहासिकता दिन आया जब सुप्रीम कोर्ट ने सदियों पुराने इस विवाद को हमेशा-हमेशा के लिए निपटा दिया।
सर्वोच्चता अदालतों ने संपूर्णता विवादित परिसरों पर भगवान रामलला का मालिकाना हक़ दे दिया गया
और उनके भव्य मंदिर निर्माण के लिए केंद्र के श्री नरेंद्र मोदी सरकार को तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी।
और अदालत ने सरकार को मुस्लिम पक्ष को भी मस्जिद बनाने के लिए अयोध्यावासियों में किसी महत्वपूर्ण स्थान पर 5 एकड़ जमीन देने का आदेश भी दे डाला

और अदालत के इसी आदेश के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 5 अगस्त, 2020 को वहां भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए भूमि पूजन और आधारशिलाएं का कार्यक्रमों तय किया गया है।

 

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